Saturday, July 25, 2020

महेस कटारे 'सुगम' कीं पाँच गजलें

        



         (१.)

जे जाबें और बे आ जाबें का होंनें है
इनें हराबें उनें जिताबें का होंनें है

इनके बादे हबा हबाई सब हो गये
अब बे सपने हमें दिखाबें का होंनें है

जियत बाप खों पानी नईं दऔ सब जानत
मरे हाड़ गंगा लै जाबें का होंनें है

पथरन पै जल ढार ढार पथरा हो गये
सपरें खोरें,तिलक लगावें का होंनें है

हिन्दू और मुसलमानन की का कैनें
मंदर जाबें, मस्जिद जाबें का होंनें है

 
              (२.)

अपनौ मौ तौ खोलौ भौजी
अरे कछू तौ बोलौ भौजी

दुनिया खों कुतका पै धर दो
इज्जत सें तुम डोलौ भौजी

सब के सब हैं खीस निपोरा
छोटौ,बड़ौ,मँझोलौ भौजी

जोंन दिखा रऔ हट्टौ,कट्टौ
है भीतर सें पोलौ भौजी

जी के मन में दया रहम है
ऊ के संगै हो लो भौजी

बातन खों कैवे के पैलें
सुगम मनई मन तौलौ भौजी

(कुतका...... ठेंगा।खीस निपोरा.... दाँत दिखाने वाले)


              (३.)

जाबे खों कितऊँ तरसें तुम कऔ तौ मोरी गुँईयाँ
हम कैसें कढ़ें घर सें तुम कओ तौ मोरी गुँईयाँ

जुल्फन में तेल डारें बैठे गली में गुंडा
आबै फरूरी डर सें तुम कओ तौ मोरी गुँईयाँ

ऐसें लगत है जैसें सब छुट्टा साँड़ हो गये
बोये गये का हर सें तुम कओ तौ मोरी गुँईयाँ

मौड़ा बड़े घरन के,ऊपर सें हैं उचक्का
को बीद रऔ जबर सें तुम कओ तौ मोरी गुँईयाँ

जानें हतौ फरागत जे हैं कै टरत नँईयाँ
बैठे हम दुफर सें तुम कओ तौ मोरी गुँईयाँ

(कढ़ें....निकलें ।हर...हल ।बीदना......उलझना ।फरागत.... शौच। दुफर.... दोपहर)


              (४.)

मिला मिला कें पानी पी गये
सबरे खेत, किसानी पी गये

हड्डा अब हिलगे रै गये है
अपनी भरी ज्वानी पी गये

खुद नें तो जोरी नईं कच्छू
दौलत हती पुरानी पी गये

घर तौ घर बाहर तक चोरी
मुतकन की निगरानी पी गये

अब तौ बस खाँसत फिर रये हैं
जीवन की आसानी पी गये

(हिलगे......लटके ।मुतकन....बहुत सारे ।)



            (५.)

खोदी खाई गैरा दई है
नाक में कौंड़ी पैरा दई है

सजधज कें बरात निकरी ती
बीच घाम में ठैरा दई है

जोते,बखरे खेत डरे ते
भाँग सबई में ऐरा दई है

अफरन खों ब्यारू करवा रये
नियत लोभ नें भैरा दई है

नियम करम सब उल्टे कर दये
नद्दी नाँओं में तैरा दई है

बे हैं सबसे बड़े घोल्लाँ
धुजा धरम की फैरा दई है

(गैरा.... गहराना। नाक में कौड़ी पैराना......परेशान करना।
घाम... धूप ।ऐराना......बोना ।अफरन......भरे पेट वाले।
भैराना......लार टपकाना ।घोल्ला.....पीर ।धुजा... ध्वजा।)


✒️ महेस कटारे 'सुगम'
     बीना, सागर - बुंदेलखंड
  (बुंदेली और हिंदी गजलकार)
      भासा - बुंदेली
     रचना रूप - गजल


कमेन्ट करके जरूर बताएँ कि आपको कैसी लगीं बुंदेली रचनाएँ...
अगर आप भी अपनी रचनाएँ प्रकाशित कराना चाहते हैं, तो सम्पर्क करें :- 
 ईमेल : akhandbundelkhand@gmail.com
व्हाट्सएप्प : 9569911051
कृपया हमें लाइक, सेयर और फॉलो करें -:
फेसबुक : https://facebook.com/akhandbundelkhandmahanpanchyat
इंस्टाग्राम : https://instagram.com/akhadbundelkhandmahanpanchyat
ट्विटर : https://twitter.com/Akhandbundelkh1
संस्थापक - संपादक :- सतेंद सिंघ किसान ( https://twitter.com/kushraaz )


#अखंडबुंदेलखंडपत्तिका #समकालीनबुंदेलीरचनाकार #गजल #बुंदेलीबुंदेलखंडआंदोलन #अखंडबुंदेलखंड #बुंदेलखंडलाइव्समैटर #बुन्देली #किसानी #बुन्देलखण्ड #मिसनबुंदेलीभासाकौइतहास #मिशनबुन्देलीभाषाकाइतिहास
#AkhandbundelkhandMagazine #Gazal
#BundeliBundelkhandMovement #AkhandBundelkhand
#BundelkhandLivesMatter
#Bundeli #Kisani #Bundelkhand #MissionHistoryOfBundeliLanguage

No comments:

Post a Comment