" बैधित "
इक चुप्पी इताएँ एक चुप्पी उताएँ
कभऊं मुकदर्सक देखकें हौले सें मुसकियातई
मुसकुराहटन मैं बैधित दर्द खों
मैं समजकें चुप रेऊतई
कभऊं अंतरमन सें
धन्यबाद अदा करतई
पर ओंठन पे आकेँ
चुप्पीयई ठेहेर जाऊतई
तुमाए लानें अखंड
सिरद्धा होत भए भी
मताई का बा तुमाए
नीरें ना जाऊतई
हिरदय में उठत हैंगीं हिलोरें
कभऊं तोड़ें यी चुप्पी खों
जाकें तुमाई ओली में
चिपककेँ फिर बई
बचपन की यादन में खो जाऊं
जितै मोय हिरदय की बातन खों
तैं बिना बोलेंईं समज जाऊतई
पर टैम के करौंटा के संगे
दोईयन के बीच
जा कैसी चुप्पी करत हैंगीं बातें...।
©️ बेबी सिंघ
गोमोह - धनबाद, झारखंड
(लिखनारी, कबयत्तरी और ग्रहनी)
हिंदी सीर्सक : व्यधित
हिंदी सें बुंदेली अनुबाद : सतेंद सिंघ किसान
