१. पनबेसरी
राम नाम सत्य है,सत्य बोलो मुक्त है।
कहत भऐ ,बारी - बारी से कंदा बदलत भय अरथी मरघटाई तरफे ले जा रये ।
कंदा बदल कें पाछे आयो रामकिशन बोलो , "अच्छो भओ दरूआ मर गओ, अब उकी लुगाई शांति से तो जी पेहे।"
दूसरे ने जबाव दओ "दवा दारू को खर्चा तो बच गओ, पे उको रंडापा कैसे कटहे, चालीसक साल की तो हुईये।"
अंगारूं बढत जा रये ,दोई कानाफूसी कर रयेे,
"सरपंच ने पूछी तो हती उसे ,बोल आत्म हत्या लिखवा दयें ,कछू तो मिल जेहे तोय सरकार की तरफ से।"
"उने तुरतई जवाब दओ, दारू पी-पी के खदई तो मर गये, अबे उमरई का हती उनकी ।"
"सरपंच ने फिरसें समझाई ,बोल तो फिर,थोरे चक्कर लगाने पर हे,आत्म हत्या को हल्ला करवा दयें, सबरी लिखा पढी हम करवा लेंहे।"
"तुरतई बोली, रहन दो सरकार हमें साबित करत- करत न जाने कितनी बार मरने पर हे।"
"बडी हिम्मत बारी है नट गई एकदम..."
"हओं तुमने सरपंच की नजरें नई देखी हती।"
"तो रांड की अब का आरती उतरहे सब एसई देख हें।"
"तो, ते काय नही हाथ पकर लेत,कब लो रडुंआ घूमत फिरहे।"
"न रे भईया, हम उकी बरोबरी के नईया बडी समझदार,हिम्मत बारी और गंगा सी पवित्र हे बा।"
"तोय कैसे पतों..."
मिट्टी मरघटाई तक पोंच गई ,"देखो तो जो का हो रओ।"
"मरघटाई में जनानी पहली बार देखी, कह रई दाग हमई देहें।"
"अब देखत जाओ का करहे पनबेसरी।"
२. हमाई फोटू
हमाये परोस की भौजी बड़ी रूपवान और होशियार हैं,आज उनने चाय पे बुलाओ।
बड़ी मीठी-मीठी बातें करती हैं ,निखालिस दूध की चाय पियाई पे ...
मैंने कई "भौजी, हमें शक्कर की बीमारी नईया।"
वे बोली "ऐसई एक आध हफ्ता बंध के तो आत रओ, हो जेहे ,आदत डार लो अभई से।"
हमाई समझ में कुछ न आई।
उनने कई "तुम्हारे भैया कछु काम के नईंया, हमने एक काम की बोली तो कहने लगे मर कें भी जो काम नई करा पेहे।
तो हमने कई मरे तुमाय दुश्मन। तो बे कहन लगे, हमारो तो कोऊ दुश्मन नईंया।
हमने बताई सगो भैया और परोसी से बडो कोऊ दुश्मन नई होत।"
"भौजी हम से का दुश्मनी तुमारी?"
"अरे तुमारी बात नईं कै रये ,तुमसे काय की दुश्मनी, बस हमारो एक काम करा दो, देखो हम लेन में ना लग हैं । पेलें एक बेर गए थे सब ऐसे देख रये थे कि कछू न पूंछो हम तो तुरतई भग आये।"
"हमारे होत भये तुम लेन में काय लगहो ,
हम कबे काम आहें।"
"हमने जाई तो कही तुम्हारे भैया से,जो लो वोटर कारड़ ,राशन कारड़ और हमारी फोटो।"
"बडी़ सुंदर फोटो है जा तो बताओ करने का है?"
"बस हमारो आधार कारड़ बनवा दो।"
३. सनसनाते बान
"कहाँ मर गई करम जली?"
"तुमाय मूड पे तो बैठी हूँ।"
"रोटी बनाई कि नई ?"
"कब की बन गई,ठूंस लो।"
"भोतई जुबान चलन लगी है।"
"तो का चुप्पई चाप बैठे रये।"
"कछू कर धर की तो है नइयां,जुबान चला रई गज भर की "
"और का करन लगे, कर तो रय गुलामी तुमाई और तुमाय बेटा की।"
"का गुलामी कर रई,पांच साल हो गए?"
"पांच का पंद्रह हो जेहे।"
"तो का ऐसई बैठी रेहे,बांझ।"
"ऐ अम्मा, मोय बांझ आंझ न कहियो,
तुमारो बेटा कछू काम को नईयां,देखबे को ही पहलवान है।"
"का कह रई,नाशमिटी।"
"सांची कह रई सो मिर्ची लगन लगी।"
"ते सांची -आंची कछू न कह,ढकी है सो ढकी रहन दे।"
"तो का करन लगें।"
" आंखें मीच ले और मोय अगले बरस लो खिलोना दे दे खिलाबे।"
✒️ पबन जैन, जबलपुर
भासा - बुंदेली
(9425324978, jainpawan9954@gmail.com,
पंजाब नैशनल बैंक सें रिटार होबे के बाद लघुकथा के परिंदे मंच सें जुरे। हिन्दी और बुन्देली में समानांतर लेखन...)
कमेन्ट करके जरूर बताएँ कि आपको कैसी लगीं बुंदेली रचनाएँ...
अगर आप भी अपनी रचनाएँ प्रकाशित कराना चाहते हैं, तो सम्पर्क करें :-
ईमेल : akhandbundelkhand@gmail.com
व्हाट्सएप्प : 9569911051
कृपया हमें लाइक, सेयर और फॉलो करें -:
फेसबुक : https://facebook.com/akhandbundelkhandmahanpanchyat
इंस्टाग्राम : https://instagram.com/akhadbundelkhandmahanpanchyat
ट्विटर : https://twitter.com/Akhandbundelkh1
संस्थापक - संपादक :- सतेंद सिंघ किसान ( https://twitter.com/kushraaz )
#अखंडबुंदेलखंड
#बुंदेली
#किसानी
#बुंदेलीबुंदेलखंडआंदोलन
#समकालीनबुंदेलीरचनाकार
#लघुकथा

No comments:
Post a Comment