ई जीवन की दुख तकलीफें काँ तक सैवें
जोंन आज कौ वौइ काल कौ रोवौ धोवौ
रातें बेइ खरारी खटिया जग कें सोवौ
अपने मन की खदकत बातें की सें कैवें
सोचत हैं हर साल कर्ज सें पीछौ छूटै
मेंनत करत लगावें लग्गत खून सुकावें
करें किसानी पानी देवें और रखावें
कभऊँ परत हैं औरे फिर कऊँ बादर रूठै
फसल कभऊँ नें साबत आवै टोटौ परवै
सपनन की धूरा बँट जावै देखत देखत
उमर चली गई मन के फौला सेंकत सेंकत
गुस्सा आवै परमेसुर खों उठा पटकवै
कत हैं मनौ मिलत नंईयाँ राहत सरकारी
है किसान की सांसऊँ हर सत्ता हत्यारी
✒️ महेस कटारे 'सुगम'
बीना, सागर - बुंदेलखंड
(बुंदेली और हिंदी गजलकार)
भासा - बुंदेली
रचना रूप - सॉनेट
#बुंदेलीबुंदेलखंडआंदोलन
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