" बनारस "
अपनेई रंग्ग में रंगों,
रहीसी ठाट-बाट कै संगे,
भोलोभालो और मौजमस्ती में हैगो पूरौ,
घाट - घाट पे गमछो पैंरें घूमें,
घूमत- फिरत हर मौडा लैकें हांत में गठजज्जा,
बेफिकर होकें हर रातै।
यी गेलन की जा खास बात,
ना पूछ इतै तैं जात - बिरादरी,
खाबेपीबे के सौकिया जे,
बैठ ढियांडें घाट सअर के,
करत जे देहात की बात।
केदार की पढ़कें कबिता बनारस,
मन में आई इक सौगात,
ना जानें कितैक खुबसूरत होयगौ,
बनारस कौ बो पाबन घाट,
मेला - ठेला सैर - सपाटो,
घुमंतुअन कै मनोरंजन कौ है राज,
बैठ ढियांडें घाट पे,
देखें सुंदरता की धार,
अबे हैगी सिरफ जई इक आस।
✒️ प्रेरना मिसरा
नोएडा
(छात्तरा : दिल्ली बिस्ओबिद्यालय और हिंदी लेखका)
हिंदी सें किसानी - बुंदेली अनुबाद : सतेंद सिंघ किसान
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